Thursday, November 1, 2012

रोज़ कुछ न कुछ नए तरीके खोज लेता हूँ

आज भी जब कभी आप के हाथो से खाना खाने का मन होता है
छुरी कांटे छोड़ मैं अपने हाथो से खाना खा लेता हूँ
जब कभी आपकी मीठी लोरी कहानियो की याद आती है
खुद को थपकी दे सुला लेता हूँ जब कभी आप की शाम की आरती की आवाज़ को सुन ने का दिल करता है
मैं वापस अपने बचपन के सुनहरे काल में पहुच जाता हूँ
जन्हा सुबह शाम आप की आरती के मीठे बोल मेरे कानो पे पड़ते है
जब कभी आप को साकछात नमन करने का मन करता है
मैं दुर्गा माँ को नमन कर लेता हूँ
यूँ तो हमेशा आप की कमी मेहसूस करता हूँ
पर यूँ ही खुद को बहलाने के लिए आप को अपने पास महसूस करने के लिए
रोज़ कुछ न कुछ नए तरीके खोज लेता हूँ

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