Wednesday, December 11, 2013

तुम अज़ीज़ हो बहुत अज़ीज़

मेरा और तुम्हारा क्या रिश्ता है आज इसे परिभाषित कर ने में मैं असमर्थ हूँ
तुम्हे पाने के बारें में कोई ख्याल नहीं किया कभी भी
पर आज तुम्हारे जाने भर के नाम से दिल बैठ सा गया है
बस एक ही आवाज़ है जो निकल रही है सीने से
"तुम अज़ीज़ हो बहुत अज़ीज़"

Friday, December 6, 2013

गुलाबी ठण्ड

ऐसी ही कुछ सर्द रातें थी जब तुम मेरे पास थी
वो लॉन कि बेंच पे साथ साथ बैठ के चाँद सितारो को निहारा करते थे
सर्द हवाओ के झोके जब भी हम को छू जाते थे
तुम अपनी ओड़ी हुयी शॉल मुझे भी उडा देती थी
और शरारत करते हुए अपनी ठन्डी हथेलियों से मेरे गालो को छू लेती थी
आज फिर सर्द रात है और मैं तनहा बैठ हूँ लॉन कि बेंच पे
तुम्हारी ओड़ी हुयी शॉल अकेला ओढ़े
पर शायद इस गुलाबी ठण्ड को भी तुम्हारी आदत पता है
आते जाते सर्द हवा के झोके हौले से मेरे गालो को छू जाते है
कुछ कुछ तुम्हारी ठन्डी हथेलियों का एहसास दिला जाते है

Thursday, December 5, 2013

ख्याल

आज तबियत थोड़ी नासाज़ सी है।लगता है दूर कहीं तुम उदास हो,एक बार ज़रा मुस्कुरा दो,कि मेरी रूह को थोडा आराम मिले।

आप से मोहबत है ये बार बार कहने में भी मुझे कोई गुरेज़ नहीं क्यूँ कि जो सनातन सत्य है वो कभी भी नहीं बदलता |



Wednesday, October 23, 2013

अमानत

जाते जाते वो अपनी सारी अमानत समेट रही थी
मैं स्तब्ध सा देखता रहा , जाने फिर क्या सूझा उसे
की पलट के मुझ से पूछा की उस का कुछ रह गया है क्या मेरे पास
मैं भी क्या कहता उससे उस की तो न जाने कितनी चीज़े रखी हुई थी मेरे पास
उस की बचपन की वो टूटी हुई पायल ,
किताब कापियो के वो पन्ने जिस पर उसका और मेरा नाम लिखा था उस ने
उस के आंसुओ से भीगे हुए कुछ गिले रुमाल
होली का वो गुलाल जो उस ने मेरे गालो पे लगाया था
कुछ मिठाई के टुकड़े जो हम दोनों ने मिले के चुराए थे
कुछ टॉफियो के रेपर
कुछ सूखे हुए न जाने कितने फूल भी है
और भी बहुत कुछ है जो सहेज के रखा हुआ है
शायद उस को भी पता है ये सब लेकिन माँगा नहीं उस ने मुझसे
पर हाँ जाते जाते अपने आंसुओ से भीगा हुआ एक और रुमाल दे गई
अपनी एक और अमानत संभल के सहेज के रखने के लिये….

Monday, September 16, 2013

घडी दो घडी

घडी दो घडी तो साथ चले थे घडी दो घडी और साथ चले ने की बात थी
घडी दो घडी में यूँ तो तुम्हारा कुछ ना बदलता बस मेरे कुछ खवाब हकीक़त बन जाते
ख्वाबो की फेह्रत यूँ तो बहुत लंबी थी पर एक खवाब था
तुम्हारी हथेलियों में अपने हाथो से मेंहदी रचाऊ
तुम्हारे पैरो में अपनी पसंद की पायल पहनाऊ, तुम्हारे हाथो में तीज की चूड़ियाँ पहनाऊ
रोज तुम्हारी मांग में सिंदूर लगाऊ, जो दिल के बहुत करीब था और अब भी है ।
खैर आज हकीक़त ये है की इन्ही अधूरे खवाबो से सजी हुई है मेरी ज़िन्दगी
तुम साथ न चली घडी तो घडी तो क्या
मैं इन्ही टूटे अधूरे खवाबो के साथ घडी तो घडी चल लेता हूँ
ताकी तुम से इन खवाबो को कभी कोई गिले सिक्वे न रहे

Sunday, August 25, 2013

फिर तेरे शहर तेरी गलियों से गुजर लौटा था

फिर तेरे शहर तेरी गलियों से गुजर लौटा था

तेरी गलियों की धुल जिस ने कभी तुझे छुआ था उस से अपने सीने में समेटे हुए लौटा था

तेरे शहर की हवाओ से तेरी महक चुरा के लौटा था

तेरे शहर से तेरी एक झलक अपनी आँखों अपने तस्वुर में बसा के लौटा था

तेरे शहर तेरी गलियों से अपनी मोह्बत के किस्से कानो पे रख ले लौटा था

लौटते लौटते अपना दिल तेरे दर पे छोड़ आया था

हो सके तो अपनी कुछ खाई हुई कसमें याद कर लेना ,

तुम्हारे दर पे रख हुए तनहा दिल को उस के दिल से मिला देना

इसे मेरी इंतेज़ा समझ पूरा कर देना

क्यूँ की मैं अभी अभी तेरी मेरी उस दीवानी मोह्बत की रवानगी के दौर से होकर लौटा था !

Sunday, July 7, 2013

मन्नत का धागा

कुछ तो जज़्बात थे तुम्हारे भी दिल में मेरे लिए वरना यूँ तुम रोज़ दरगाह पे मेरे लिए मन्नत का धागा न बांधती

मेरी सलामती के लिए सजदे में दुआएं न मांगती

मुझसे पहेले सायद तुम ये जान चुकी थी की हम मोहबत तो कर सकते है लेकिन एक दुसरे के कभी हो नहीं सकते

तुम्हारी मन्नतो सजदो का कुछ असर मुझ पे भी हो गया था मैं भी कुछ कुछ तुम्हारे दिल-ओ -दिमाग में चलने वाले खयालो को समझने लगा था

तुम्हे किसी और की होते देखना इतना आसान ना था ,जानता था मुझ से ज्यादा तकलीफ तुम्हे हो रही थी

जिसे तुम हंस के सह रही थी , लेकिन तुम्हारे उस दर्द को महसूस कर सीने में मेरे भी दर्द भर रहा था

यकीन हो चला था की अब तुम्हारे जाने के बाद ज़िन्दगी आसान तो न होगी

पर तुम्हारे बिना मैं भी पुरे ईमान से मोहबत के मजहब को निभा रहा था

अब मैं हर दरगाह पे जा के तुम्हारे लिए मन्नत का धागा बांध रहा था