Thursday, January 7, 2016

वो ज़िन्दगी भी हमारी होगी

मेरे संघर्षो पे इतना खुश न हो ऐ ज़िन्दगी
वो तो हम तेरी तसल्ली के लिए तेरी शर्तो पे जी जा रहे है
जिस दिन हम अपनी ज़िद पे आ गए
उस दिन हर ख़ुशी भी हमारी होगी हर शर्त भी हमारी होगी
और वो ज़िन्दगी भी हमारी होगी.

Thursday, December 10, 2015

बदला कौन था ये तो कहना मुनासिब ना था

बदला कौन था ये तो कहना मुनासिब ना था
पर ना तुम पहले जैसे थे और ना हम पहले जैसे थे
वक़्त को कुछ दोष दिया जा सकता था
पर वो भी क्या मुनासिब होता
जो दिल के कोने में दबी हुई मोहबत थी
जिम्मेदारियों ने उस मोह्बत को साँस लेने तक का भी वक़्त ना दिया था
और आलम ये था की दिल के क़ब्रिस्तान में दफ़न उस मोह्बत
को लेकर जिए तुम भी जा रहे थे और जिए हम भी जा रहे थे
बदला कौन था और कौन नहीं था ये भी कहना मुनासिब ना था

अंदर कुछ ज़िंदा है यही बहुत था

मैं बंधन में था या बंधन मुझमें
मैं पूरा था फिर भी अधूरा था
बहुत कुछ कहना चाहता था पर खामोश रहा
जिसका इंतज़ार था वो इंतज़ार ही रहा
अपनी उलझनों में उलझा दुसरो की उलझने दूर करता रहा
हटके जीना चाहता था पर हट ना सका
खुद को खो कर खुद को ढूंढ़ता रहा
कभी दोराहे कभी चौराहे पे रहा
हर राह से अपनी मंज़िल को पता रहा
पर मैं अपने मक़सद से और मेरा मक़सद मुझसे अनजान रहा
हासिल बहुत कुछ था पर खाली था
जो शुरू नहीं हुआ था उस का अंत आ गया था
जो टूट गया था वो कभी जुड़ा ही नहीं था
मैं रुका था फिर भी चल रहा था
मैं ज़िंदा था या कुछ एहसास ज़िंदा थे जानता नहीं
पर अंदर कुछ ज़िंदा है यही बहुत था

Wednesday, June 24, 2015

वो हो तुम

सूखी मिटी में जो खुशबु भर दे वो हो तुम
भीगे गीले मौसम में गरम चाय हो तुम
हर किसी की आँखों का इंतज़ार हो तुम
पेड़ो के पत्तो को जो एक नया सुन्हेरा रंग दे वो हो तुम
बारिश के पानी में इठलाती बलखाती कागज की नाव हो
तुम उदास मायूस चेहरे पे जो ख़ुशी ला दे वो हो तुम
किसी हसीं के गालो पे रुकी हुई बारिश की वो इक बूँद हो तुम
बंज़र ज़मीन में जो एक नया जीवन भर दे वो हो तुम
झुठ मुठ रूठे हुए छोटे बच्चे की नटखट मुस्कान हो तुम
घनी बारिश लिए पिले सूरज की सांज हो तुम
पांच रोज़ी नमाज़ी का ईमान हो तुम
बेरंग चीज़ों में जो रंग बिरंगे रंग भर दे वो हो तुम
आसमान के कैनवास पे जो अपनी छठा बिखेर दे वो हो तुम
जिस की अदा ओ पे ग़ज़ल लिखी जा सके वो हो तुम
जिस की नज़ाकत नफासत पे दुनिया कायल जो जाये वो हो
तुम दीवानो को जो दीवानगी सीखा दे वो हो तुम
जिस को देख के दिल में एक गुद गुदी हो जाये वो हो तुम

लिखता हूँ

कहते है बातें करने से दिल का बोझ कम होता है
मैं लिखता हूँ की आत्मा का बोझ कम हो सके

Tuesday, June 16, 2015

सपनो से वफ़ा

तेरे लिए रुक जाने में कोई हर्ज़ नहीं है
अब तक तो तुझे जीता आया ही था कुछ और जी लेता तो भी शायद कुछ न बदलता
पर अब कुछ समय खुद को खुद में जीना चाहता हूँ
पर खुद से कभी वादा किया था कभी रुकुंगा नहीं
चाहे जो भी हो बस चलता रहूँगा
ऐसा नहीं की अब तुम्हारी लिए मेरी भावनाए बदल गयी है
आज भी तुमसे वही मोहबत वही तालुक़ात है मेरे दिल के
लेकिन ये जो मेरे सपने है उनका भी अपना एक अस्तित्व है
अब कुछ पल उनको जिन चाहता हूँ
तुझे से बेवफाई का कोई इरादा नहीं है और ना कभी कर पाउँगा
बस अब खुद से खुद के सपनो से वफ़ा करना चाहता हूँ

बेसब्र ज़िन्दगी

इतनी बेसब्र क्यों है ज़िन्दगी कुछ लम्हा ठैर जाये तो क्या
बहुत कुछ है कहने को बहुत कुछ है करने को
बस थोड़ा खुद को समझ लू थोड़ा खुद को जान लू तो क्या
अभी मैं खुद से कुछ कहना चाहता हूँ
इन लम्हों में रुकना चाहता हूँ अपने आप से मिलना चाहता हूँ
लगता है जैसे कितने समय से चल रहा हूँ
कुछ देर ठैर के पीछे मुद के देखना चाहता हूँ
ये बेसब्र ज़िन्दगी क्या इतना भी मौका नहीं देगी मुझे
ज़िन्दगी इतनी भी तो बेरहम तो नहीं
अभी थोड़ा इश्क़ बाकि है ज़िन्दगी का मेरे लिए
शायद वो भी मुझसे चाहती है की मैं खुल के जी लू जी भर के
पीछे कोई अफ़सोस ना रहे फिर ज़िन्दगी से
बस जब भी मिले मैं और ज़िन्दगी मुस्कुरा के मिले