Monday, December 23, 2013

तुमसे दूर

तुमसे दूर जाने के लिए निकला था और तुम से बहुत दूर आ भी गया था
पर सच में तुमसे दूर हो पाया था क्या ये एक बड़ा सवाल था
तुमसे इतना दूर हूँ फिर भी लगता है जैसे तुम हर पल मेरे पास हो मेरे साथ हो
लगता है जैसे मेरी हर बात का ख्याल तुम रखती हो
कब दवाई खानी है कैसे अपनी सेहत का ख्याल रखना है सब तुम बता देती हो
जब भी चाय बनाता हूँ लगता है मिठास तुम ने घोल दी है
चाय के कप से भी तुम्हारे हाथो कि महक आती है
मेरे हर काम में जाने कैसे तुम्हारा एहसास महसूस होता है
मेरे आस पास कि हवा में भी तुम्हारी खुशबू होती है
बस यही एक उलझन है जिस से आज तक निकल नहीं पाया हूँ
अगर तुम इतनी दूर हो तो फिर इतने करीब कैसे
और इतने करीब तो फिर इतनी दूर कैसे

Sunday, December 15, 2013

ये दिल

ये दिल है ना मेरे सीने में कुछ गुमसुम चुपचाप सा रहता है
धड़कता भी नहीं है
जब कभी कोई तुम्हारा नाम लेता है एक दो पल के लिए ये धड़कना सीख़ लेता है
मैं बहुत असमंजस में रहता हूँ कि इस का क्या करू
बस तुम से एक गुज़ारिश है जब कभी इधर से गुज़रो इस से मिलते जाना
इस पर अपना हाथ रख देना
इस से थोड़ी बहुत बातें कर लेना
शायद इस मेरे दिल को कुछ राहत मिल जाये
और ये दिल फिर से पहले कि तरह खिल खिलाकर धड़कना सिख जाये

रस्म अदाएगी

जाते जाते रस्म अदाएगी के लिए ही सही बस इतना कर कर जाना
एक बार अपनी बाहो में ऐसे समेत लेना कि फिर मैं किसी बंधन में बंध न सकू
अपनी साँसो को मेरी साँसो में इस कद्र मिला देना कि फिर कभी सांस लेने कि जहमत ना उठा सकू
मेरी आँखों से सारा पानी भी लेते जाना कि फिर रोऊ तो बहुत पर आँसू न छलका सकू
हो सके तो अपनी खुसबू भी मुझ में छोड़ जाना कि तुम्हारी उस खुशबू के लिए मैं कस्तुरमुर्ग कि तरह दर बदर भटकता रहू
अपने दिल को मेरे दिल से ऐसे मिला देना कि फिर मेरा दिल कहीं और लग ना सके धड़क न सके
कुछ इस तरह छू के जाना कि कोई और मुझे छू ले तो मैं ताश के पत्तो के महल जैसा ढह जाऊ
जाते जाते कुछ ऐसी रस्मे निभा जाना कि फिर और कोई भी रस्म निभाने कि गुंजाइश न रहे

Wednesday, December 11, 2013

तुम अज़ीज़ हो बहुत अज़ीज़

मेरा और तुम्हारा क्या रिश्ता है आज इसे परिभाषित कर ने में मैं असमर्थ हूँ
तुम्हे पाने के बारें में कोई ख्याल नहीं किया कभी भी
पर आज तुम्हारे जाने भर के नाम से दिल बैठ सा गया है
बस एक ही आवाज़ है जो निकल रही है सीने से
"तुम अज़ीज़ हो बहुत अज़ीज़"

Friday, December 6, 2013

गुलाबी ठण्ड

ऐसी ही कुछ सर्द रातें थी जब तुम मेरे पास थी
वो लॉन कि बेंच पे साथ साथ बैठ के चाँद सितारो को निहारा करते थे
सर्द हवाओ के झोके जब भी हम को छू जाते थे
तुम अपनी ओड़ी हुयी शॉल मुझे भी उडा देती थी
और शरारत करते हुए अपनी ठन्डी हथेलियों से मेरे गालो को छू लेती थी
आज फिर सर्द रात है और मैं तनहा बैठ हूँ लॉन कि बेंच पे
तुम्हारी ओड़ी हुयी शॉल अकेला ओढ़े
पर शायद इस गुलाबी ठण्ड को भी तुम्हारी आदत पता है
आते जाते सर्द हवा के झोके हौले से मेरे गालो को छू जाते है
कुछ कुछ तुम्हारी ठन्डी हथेलियों का एहसास दिला जाते है

Thursday, December 5, 2013

ख्याल

आज तबियत थोड़ी नासाज़ सी है।लगता है दूर कहीं तुम उदास हो,एक बार ज़रा मुस्कुरा दो,कि मेरी रूह को थोडा आराम मिले।

आप से मोहबत है ये बार बार कहने में भी मुझे कोई गुरेज़ नहीं क्यूँ कि जो सनातन सत्य है वो कभी भी नहीं बदलता |



Wednesday, October 23, 2013

अमानत

जाते जाते वो अपनी सारी अमानत समेट रही थी
मैं स्तब्ध सा देखता रहा , जाने फिर क्या सूझा उसे
की पलट के मुझ से पूछा की उस का कुछ रह गया है क्या मेरे पास
मैं भी क्या कहता उससे उस की तो न जाने कितनी चीज़े रखी हुई थी मेरे पास
उस की बचपन की वो टूटी हुई पायल ,
किताब कापियो के वो पन्ने जिस पर उसका और मेरा नाम लिखा था उस ने
उस के आंसुओ से भीगे हुए कुछ गिले रुमाल
होली का वो गुलाल जो उस ने मेरे गालो पे लगाया था
कुछ मिठाई के टुकड़े जो हम दोनों ने मिले के चुराए थे
कुछ टॉफियो के रेपर
कुछ सूखे हुए न जाने कितने फूल भी है
और भी बहुत कुछ है जो सहेज के रखा हुआ है
शायद उस को भी पता है ये सब लेकिन माँगा नहीं उस ने मुझसे
पर हाँ जाते जाते अपने आंसुओ से भीगा हुआ एक और रुमाल दे गई
अपनी एक और अमानत संभल के सहेज के रखने के लिये….