Wednesday, June 8, 2016

​​" और कुछ नहीं "

​​" और कुछ नहीं " ये अल्फ़ाज़ होते थे हमेशा
वक़्त ऐ रुक्सत अलविदा कहने के लिए
और मैं समझ जाता था उस " और कुछ नहीं " ​ में
दबी हुई उनकी फ़िक्र और बेइंतहा मोहबत मेरे लिए
जानता था वो ज्यादा कुछ और कहेंगी नहीं
उनके बंधन उनकी मज़बूरी बखूबी पता थे मुझे
मैं अपना सार दिल निकल उनके सामने रख देता
और वो एक खिड़की भी खुली नहीं छोड़तीं थी अपने दिल की
ये थी मेरी और उनकी इश्क़ की दास्ताँ
मैं पूरी किताब लिख देता तो भी अधूरा था
और वो चंद अल्फाज़ों में पूरी थी ।

वफ़ा बेवफा के इलज़ाम तब भी होंगे पर तुम मुझसे और मैं तुमसे कभी जुदा नहीं होंगे

सारे रास्ते एक एक कर बंद हो गए
सारी कोशिश नाकामयाब रही
ना तुम मुझसे मिल सकी
ना मैं तुमसे मिल सका
बातें हमारी जंहा थी वहीं रही
दिल के दर्द को नापने का कोई माप ना रहा
तरसते तरसते तुम्हारे लिए
मेरी मोह्बत को फकीरी लग गयी
टूटने का आलम ये था पत्थर भी शर्मिंदा थे
पर्याय था बस जैसे हो हालात को काबू किया जाये
पर तक़दीर को ये भी रास ना आया
मेरे जिगर के लहू से समझौता तैयार किया गया
मैं नहीं था पर मसौदा था
पढ़ते पढ़ते उसने हर शब्द पे बेवफा कहा
अफ़सोस उस की उँगलियाँ मेरे लहू को छू कर भी पहचान ना पाई
और मैं सोचता रहा ता उम्र हम दोनों की रगो में एक खून दौड़ता है
खैर इस जनम के लिए अजनबी अंजान सही
पर कभी तो न्याय होगा
फिर किसी दूसरे जनम में यहीं से शुरू करेंगे जहाँ से छूट रहा है
वफ़ा बेवफा के इलज़ाम तब भी होंगे पर तुम मुझसे और मैं तुमसे कभी जुदा नहीं होंगे ।

Thursday, May 5, 2016

अजीब था तेरा और मेरा रिश्ता

कितना अजीब था तेरा और मेरा रिश्ता
मैं सोचता था तेरे लिए और तुझे दुनिया की पड़ी थी
मुझे तेरी फ़िक्र थी और तुझे दुनिया की
मैं तेरी ख़ुशी के लिए अपनी ख़ुशी छोड़ देता
और तू किसी और के लिए खुद की ख़ुशी
मेरी ज़िन्दगी में सबसे ज़्यादा मायना तेरा था
और तेरी ज़िन्दगी में मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं था
तू मुझे मिल जाती तो मुझे किसी की जरुरत नहीं थी
और तेरे पास मैं था फिर भी मुझे छोड़ तुझे बाकि की जरुरत थी
तुझसे एक बार बात हो जाये तो मेरा दिन और दिल दोनो बन जाते थे
और मेरी बातें तेरे लिए चंद शब्दों से ज्यादा कुछ नहीं थे
तेरे होने ना होने का पता मुझे मेरी धड़कने बता देती थी
और तेरी धड़कने मैं अब तक सुन नहीं पाया था
मैं तुझे देख अपनी सारी तकलीफें भूल जाता था
और तू अक्सर मुझे भूल जाती थी
मैं तड़पता रहता था तेरा एक मैसेज पाने के लिए
और तेरे पास वक़्त नहीं था मुझे जवाब देने के लिए
तूने मेरे बारे में कभी सोचा नहीं
और मैंने तेरे अलावा कभी कुछ सोचा नहीं
तेरे हर आँशु की कीमत पता थी मुझे
और मेरे आँशु तेरे लिए खारे पानी से ज्यादा कुछ नहीं थे
कितना अजीब था तेरा और मेरा रिश्ता
तूने मुझे कभी अपना माना नहीं
और मैंने तेरे सिवा किसी और को अपनाया नहीं

मेरे मज़हब का मैं पहला पैग़म्बर बन गया

माना मेरे और तुम्हारे रिश्ते का कोई नाम नहीं
लेकिन हर रिश्ते का नाम हो ये भी तो जरुरी नहीं
जाने कब मेरे जन्म का धर्म छूट गया मुझसे
तुम से मोहबत मेरा नया मज़हब बन गया
एक मंगलसूत्र और सात फेरे से तुम किसी और की हो गयी सात जन्मों के लिए
कई कल्पो की मेरी मोह्बत , तुम को एक पल के लिए भी मेरी नहीं कर पाई
तुम खुश थी कहीं और किसी और के साथ
और मैं तड़प रहा था तुम्हारे लिए
जाने कितनी बार तुमसे कुछ कहना चाहा
लेकिन हर बार बात कल पे आके रुक गयी ,
वो कल जो कभी आया ही नहीं
जो बात अधूरी थी वो अधूरी रह गयी
मेरी हर कोशिश नाकाम रह गयी
ना तुम से पूरा कह पाया ना तुम से पूरा सुन पाया
अफसोस तो ये था, तुम्हारे लिए ज़माने के दस्तूरो का महत्व था
लेकिन मेरी अनमोल मोह्बत का कोई मूल नहीं था
मैं तुम्हारे लिए करना बहुत कुछ चाहता था
पर सब ख्यालो में रह गया
मेरा और तुम्हारा ये किस्सा सिर्फ ज़ुबानों पे रहा
हक़ीक़त ना बन पाया
मेरा जो इंतज़ार था वो इंतज़ार ही रहा
और मेरे मज़हब का मैं पहला पैग़म्बर बन गया

रचना का जन्मदिन था

आज रचना का जन्मदिन था ,सुबह से दिमाग में भी था लेकिन ऑफिस के काम के चकर में ऐसा फसा की रात के १२ बजे गए ।
मैं उस को wish भी नहीं कर पाया था , पता था वो मेरा इंतज़ार कर रही होगी ।

घर पंहुचा तो देखा रचना और माँ बैठ के मेरा इंतज़ार ही कर रहे थे । बैग रखते ही माँ बोली जा रचना के साथ कुछ खा ले , उस ने कुछ खाया नहीं है, सुबह से तेरा इंतज़ार कर रही है ।

मुझे खुद पे बहुत गुस्सा आया लेकिन तभी रचना मुझे किचन में ले आई । जल्दी जल्दी के चक्कर में मैं केक लाना भी भूल गया था , लेकिन किचन के प्लेटफार्म पे देखा एक छोटा सा केक बन रख हुआ था ,रचना ने अपने बर्थडे के लिए केक भी खुद ही bake कर लिया था घर पे ।

केक का छोटा सा टुकड़ा मेरे हाथो में देते हुए बोली अब खिला भी दो सुबह से wait कर रही हूँ.. बहुत ज़ोरो की भूक लग गयी है।

मेरी आँखों में पानी आ गया था । अपने हाथो से रचना को केक खिलाया और और उस के होठो पे जो केक लग गया था ,रचना को kiss करते हुए मैंने थोड़ा खा लिया और रचना को कस के अपने सीने से लगा लिया ।पता नहीं हम दोनों एक दूसरे से गले लग के रोते रहे । हम दोनों जानते थे की हम एक दूसरे से कितनी मोह्बत करते है इसलिए हमे कभी शब्दों की जरुरत पड़ती ही नहीं थी ।

अब वक़्त था रचना के कुछ और surprises का ,मोबाइल ऑन किया तो देखा रचना के मैसेज , बहुत सारे एक एक लाइन के ।
सारे मैसेज में मेरी और उसकी कुछ ख्वाहिशें लिखी हुई थी ।
जैसे जैसे मैसेज पढ़ते गया मेरे चेहरे पे हंसी और भी गहरी होती गयी ।

१. साथ में पाकिस्तान घूमने जाना
२. रोज़ खाने का एक निवाला एक दूसरे को खिलाना चाहे जो भी परिस्थिति रहे
३. उस के चाय के कप की पहली चुस्की मेरी और मेरे कप की उसकी
४. हर महीने उस के लिए कांच की चूड़ियाँ लाना
५. हर वीकेंड उस की पसंद की एक मूवी साथ में देखना
६. हर महीने के एक दिन मेरी पसंद की ग़ज़ल साथ में सुनना

ऐसी ही और भी बहुत सारी ख्वाहिशें लिखी हुई थी । ये रचना थी मेरी रचना , क्या surprise कर दे , surprise दे दे कुछ कह नहीं सकते ।

Tuesday, April 12, 2016

​मैं बंधन में था या बंधन मुझे में

​मैं बंधन में था या बंधन मुझे में
मैं पूरा था फिर भी अधूरा था
बहुत कुछ कहना चाहता था पर खामोश रहा
जिस का इंतज़ार था वो इंतज़ार ही रहा
अपनी उलझनों में उलझा दूसरों की उलझने दूर करता रहा
हटके जीना चाहता था पर हट ना सका
खुद को खो के खुद को ढूंढता रहा
कभी दोराहे पे कभी चौराहे पे रहा
हर राह ​से अपनी मंज़िल को पाता रहा
पर मैं अपने मक़सद से मक़सद मुझे मुझसे अंजान रहा
हासिल बहुत कुछ था फिर भी खाली था
जो शुरू नहीं हुआ था उस का अंत आ गया था
जो टूट गया था वो कभी जुड़ा ही नहीं था
मैं रुका था फिर भी चल रहा था
मैं ज़िंदा था या कुछ एहसास ज़िंदा थे जानता नहीं
पर अंदर बहुत कुछ ज़िंदा है यही बहुत था

Tuesday, February 9, 2016

कुछ ख्याल

तुम से कहा बहुत बार तुमने माना एक बार नहीं, वक़्त तुम्हारे पास था तुम्हारे साथ था । मेरा वक़्त रेत की तरह मेरे हाथो से फिसल रहा था , मैं ज़िन्दगी को कुछ ऐसे जी रहा था जैसे हर दिन मेरा आखिरी हो , मेरी हर सरकती साँसों में बस तुम्हारे लिए ये पैग़ाम था की मैं तुमसे मोह्बत करता हूँ बेइंतेहा मोह्बत । मैं तुम्हे यकीन नहीं दिला रहा था बस अपने दिल के आखिरी पन्नो में भी तुम्हारे लिए अपनी मोह्बत को अमर कर रहा था । कुछ अधूरा था क्या मेरी इबादत में जो हम मिल ना सके या फिर सच्चे इश्क़ की यही मंज़िल होती है ये सब अब कुछ ठीक से कह नहीं सकता , आज मंज़िल की नहीं बस मैं राह की फ़िक्र में था ।
तुम्हारे लिए मोहबत भरी इन राहो का मैं जी भर लुफ्त उठा रहा था ,ऐसी राहें जहां मुझे कुछ साबित नहीं करना था ,सिर्फ चलते जाना था । सच कहूँ तो इसका कुछ अलग ही मज़ा था ,एक नया अनुभव था । अब तक मेरा ज़ोर मोह्बत में शिदत को था ,पर जाना की मोहबत में शिदत से ज्यादा रवानगी का होना जरुरी है । तुमसे इस मोहबत के सफ़र में बहुत कुछ सीखा बहुत कुछ जाना खुद के बारें में भी ,पहले से एक बेहतर इंसान बना । जानता नहीं मेरी इस शिदत को इस रवानगी को दुनिया कैसे आंकेगी ,हो सकता है कुछ लोग मुझे नाकाम आशिक़ भी कहे । लेकिन ये भी दावे से कह सकता हूँ की मैं मोह्बत की एक नयी मिसाल छोड़ के जाऊंगा ।
जीते जीते ना सही मर कर ही सही मेरी मोह्बत को एक मुक़म्मल अंजाम दे जाऊंगा ,मेरी हस्ती कुछ ना सही पर तुम्हारे लिए मोह्बत का एक नया शिखर छोड़ जाँऊगा ।